भगवान शिवजी God Shiva की अर्ध परिक्रमा क्यों ?

 

भगवान शिव की पूजा के बाद शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांयी ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी स्त्रोत (जहां से भगवान शिव को चढ़ाया जल बाहर निकलता है) तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें। इसे शिवलिंग की आधी परिक्रमा भी कहा जाता है। 

किस देवता की कितनी परिक्रमा...
शास्त्रों के अनुसार पूजा के समय सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा करने की परंपरा है। सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या  अलग-अलग बताई गई है, जैसे दुर्गाजी की एक, ‍सूर्य की सात, गणेश की तीन, विष्णु की चार और शिव की आधी प्रदक्षिणा  करना चाहिए।
- नारद पुराण   

किस देवता की कितनी प्रदक्षिणा करनी चाहिए, इस संदर्भ में 'कर्म लोचन' नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि- 'एका चण्ड्या रवे:  सप्त तिस्र: कार्या विनायके। हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा।' अर्थात दुर्गाजी की एक, सूर्य की सात, गणेशजी की तीन,  विष्णु भगवान की चार एवं शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए।  


#भगवान_शिव_की_अर्ध_परिक्रमा_क्यों...?
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शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''

सोमसूत्र : 
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शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।


तब लांघ सकते हैं :
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शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,

लेकिन
'शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा' का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा
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 भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।

!! ॐ नमः शिवाय !!
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